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आवाज़ से पहचाना जा सकता है डिप्रेशन, AIIMS दिल्ली के शोधकर्ताओं का दावा

आवाज़ से पहचाना जा सकता है डिप्रेशन, AIIMS दिल्ली के शोधकर्ताओं का दावा

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By UK daily Times
Feb 6, 2026 1 min read

डिप्रेशन की पहचान अब केवल सवाल-जवाब या क्लिनिकल टेस्ट तक सीमित नहीं रह सकती। अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS), दिल्ली के शोधकर्ताओं ने अपनी एक नई स्टडी में पाया है कि किसी व्यक्ति के बोलने के तरीके—जैसे आवाज़ की पिच, टोन, प्रवाह और भावनात्मक रंग—से डिप्रेशन के शुरुआती लक्षणों का पता लगाया जा सकता है।
AIIMS दिल्ली में CSR सहयोग से स्थापित स्पीच हेल्थ लैब में यह शोध किया गया, जिसमें 423 प्रतिभागियों के स्पीच सैंपल का विश्लेषण उनके क्लिनिकल और डेमोग्राफिक डेटा के साथ किया गया। इनमें अधिकांश प्रतिभागी 18 से 30 वर्ष आयु वर्ग के थे, जिससे यह स्पष्ट होता है कि युवा वर्ग इस तरह की डिजिटल मानसिक स्वास्थ्य तकनीकों से अधिक जुड़ रहा है।
शोधकर्ताओं के अनुसार, डिप्रेशन व्यक्ति की सोच और व्यवहार को प्रभावित करता है, जिसका सीधा असर उसकी आवाज़ पर पड़ता है। डिप्रेशन से ग्रसित लोगों में अक्सर बोलने की गति धीमी हो जाती है, आवाज़ एक जैसी (मोनोटोन) हो जाती है, भावनात्मक अभिव्यक्ति कम हो जाती है और वोकल एनर्जी घट जाती है।
स्टैंडर्ड साइकियाट्रिक स्क्रीनिंग में पाया गया कि करीब 32% प्रतिभागियों में क्लिनिकली महत्वपूर्ण डिप्रेशन के लक्षण थे। जब इन नतीजों की तुलना ऑटोमेटेड स्पीच एनालिसिस से की गई, तो 60% से 75% तक की सटीकता सामने आई, जो लंबे स्पीच सैंपल में बढ़कर लगभग 78% तक पहुंच गई।
यह शोध ऐसे समय में सामने आया है जब भारत समेत पूरी दुनिया में मानसिक स्वास्थ्य एक बड़ी चुनौती बन चुका है। नेशनल मेंटल हेल्थ सर्वे 2015 के अनुसार, भारत में करीब 5.3% लोग डिप्रेशन से प्रभावित हैं, जबकि वैश्विक स्तर पर यह संख्या 26.4 करोड़ से अधिक है। डिप्रेशन से जुड़ी सबसे गंभीर जटिलताओं में आत्महत्या प्रमुख है।
इस संदर्भ में NIMHANS के एक अध्ययन का भी उल्लेख किया गया, जिसमें देशभर की 30 यूनिवर्सिटीज़ के 8,542 कॉलेज छात्रों को शामिल किया गया था। अध्ययन में पाया गया कि 33.6% छात्रों में मध्यम से गंभीर डिप्रेशन, 23.2% में एंग्ज़ायटी, और 18.8% छात्रों में जीवनकाल में आत्महत्या के विचार सामने आए।
AIIMS के विशेषज्ञों ने स्पष्ट किया कि यह तकनीक क्लिनिकल डायग्नोसिस का विकल्प नहीं, बल्कि शुरुआती स्क्रीनिंग, समय पर पहचान और रेफरल के लिए एक सहायक उपकरण है। खासकर उन क्षेत्रों में, जहां मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच सीमित है, यह तकनीक बेहद उपयोगी साबित हो सकती है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि आवाज़ के विश्लेषण के ज़रिये डिप्रेशन की पहचान मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में एक बड़ा बदलाव ला सकती है और समय रहते इलाज संभव हो सकेगा।

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